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किरदार, जिनकी काबिलियत पर हैरान थे हबीब | – News in Hindi

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किरदार, जिनकी काबिलियत पर हैरान थे हबीब | – News in Hindi

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जीवित होते तो सौ बरस के होते. जिक्र हबीब तनवीर का, जिन्हें सारी दुनिया ने एक ऐसे रंगकर्मी के रूप में जाना जिसने भारत की मिट्टी-पानी और हवा की कोख से जन्मी तहज़ीब की रंगोमहक से अपना रंगमहल रचा. देहातियों की रगों में बहते हुनर को पहचाना. उन्हें किरदारों में ढाला. अदाकारी के सबक सिखाए और उनकी फ़नकारी पर नाज़ करते हुए सरहदों के पार उनकी कामयाबी का परचम फहराया.

हबीब तनवीर ने इस ख्वाब को नाम दिया था- ‘नया थिएटर’. यादों-बातों, मुलाकातों का जब भी सिलसिला छिड़ता हबीबजी अपनी शोहरत और सफलता के सवाल पर बेहिचक कहते- ‘नया थिएटर’ का मेरा सपना बीच राह में दम तोड़ देता अगर गांव-देहात के इन कलाकारों का साथ न होता. हबीबजी के इस कथन को आज उनकी जन्मशती के वर्ष में दोहराते हुए जाने कितने ही छत्तीसगढ़ी कलाकारों की याद बरबस ही कौंध उठती है. गोविंदराम निर्मलकर, भुलवाराम, मालाबाई, फिदा बाई, देवीलाल नाग, दीपक तिवारी, पूनम तिवारी, अगेश नाम… जाने कितने चेहरे, जाने कितने चरित्र और अपनी भूमिकाओं के साथ रंगमंच पर उनके अभिनय तथा लोक धुनों पर गाती-फिरती उनकी मनमोहती मुद्राएं. तालियों से गूंजते प्रेक्षागृह. लंदन का एडनबरा इंटरनेशनल थिएटर फेस्टिवल भी याद आता है जब दुनिया के 30 से भी ज़्यादा देशों से आए नाटकों में ‘नया थिएटर’ के ‘चरणदास चोर’ को प्रथम विजेता का गौरव मिला था.

हबीबजी के निर्देशन में इस नाटक को खेलने वे ही सब कलाकार थे जिन्हें नाचा की अलमस्ती में हबीबजी ने देखा और नए नसीब की इबादत लिखने अपने साथ ले आए. गांव-गली, घर-आंगन, कुटुंब-परिवार छूटा, पर इन देहातियों ने आखिरी सांस तक हबीबजी का साथ न छोड़ा.

यहां दिलचस्प कहानी उन दो छत्तीसगढ़ी कलाकारों की जो ‘नया थिएटर’ के अतीत में स्वर्णिम अध्याय की तरह आज भी दमकते हैं. ये हैं- गोविंदराम निर्मलकर और भुलवाराम.

छत्तीसगढ़ के धूल फांकते गाँव की पगडंडी पार कर गोविंदराम उड़न खटोले की सैर करते सरहद पार के मुल्कों में अपनी बेधड़क दस्तकें देते रहे. मुफ़लिसी और गुमनामी से बेपरवाह इस हरफ़नमौला फ़नकार के हुनर और क़ाबिलियत का ही कमाल था कि इस बुजुर्ग शख्सियत की पहचान के साथ ‘पद्मश्री’ का तमगा भी जुड़ गया. कभी समाज के आखि़री छोर पर गिने जाने वाले इस देहाती के दामन पर देश की प्रथम नागरिक (राष्ट्रपति) ने ख़ुद अपने हाथों सम्मान का मेडल लगाया.

नाटक की दुनिया से वाबस्ता लोगों से गोविंदराम निर्मलकर का नाम और काम अछूते नहीं हैं. हबीब तनवीर के ‘नया थिएटर’ की दर्जनों नाट्य प्रस्तुतियों में अहम चरित्रों की हू-ब-हू तस्वीरें गढ़ने में माहिर. मंच गांव, शहर, राजधानी या फिर पराए वतन के हों, हिस्से में आए किरदार चाहे जो हों, नाटक कालिदास का हो या शेक्सपीयर का, संवाद छत्तीसगढ़ी, संस्कृत, हिन्दी, उर्दू या फिर अंग्रेजी में हों, निर्मलकर की प्रतिभा निर्भीक होकर मज़े-मज़े में सारी कसौटियां पार करती रही. कौन-सी ताकत थी, जो हर कल्पना पर खरी उतरती रही? बकौल गोविंदराम- “अपनी परंपरा की शक्ति, जिसमें मिट्टी के संस्कार मिले हैं. इन्हीं में रमकर इन्हें माथे पर लगाकर हम दुनिया भर में घूम आए.” पढ़ाई के नाम पर किसी स्कूल की चौखट पर पांव नहीं रखा. कलम और काग़ज़ से भी दूर का ही नाता रहा.

संयोग की यह कहानी भी बड़ी दिलचस्प है. उमर 13 साल की थी. छत्तीसगढ़ के गांवों में नाचा कलाकार मदन निषाद की धूम थी. रात-रात भर स्वांग रचाकर नाचने-गाने की होड़ मचती. गोविंदराम की रग-रग में दौड़ता कलाकार का ख़ून उमगता और नाचा की उठती-गिरती गमक पर निहाल हो उठता. हसरत पूरी हुई. बन गए ख़ुद भी नाचा कलाकार. राह पकड़ी तो जाने-माने कलाकार दाऊ मंदराज का आसरा भी नसीब हुआ. उनके साये में संभावनाएं संवरीं. अभिनय ही नहीं, गाने और साज-बाज का शऊर भी पाया. सिलसिला बारह बरस तक चला. गोविंदराम की प्रतिभा युवा होते-होते कुंदन की तरह दमकने लगी. तभी नाचा की एक महफिल का लुत्फ़ उठाने पहुंचे हबीब की नजर निर्मलकर पर पड़ी. जैसे हीरे को जौहरी मिल गया. हबीब जी तब दिल्ली में ‘नया थिएटर’ के लिए कलाकारों का संग्रह कर रहे थे. राजधानी पहुंचकर उन्होंने गोविंदराम को बुलावा भेजा तो गांव वालों ने कहा- ‘जाओ, तुम्हारी किस्मत का सितारा अब चमकने वाला है.’ और धूल में खिला यह फूल सारे जहां में अपनी मटियारी गंध बिखेरने निकल पड़ा. चरणदास चोर, आगरा बाजार, सोन सागर, बहादुर कलारिन, हिरना की अमर कहानी, जिस लाहौर नईं वेख्या, लाला शोहरत राय, रुस्तम सोहराब, मिट्टी की गाड़ी, देख रहे हैं नैन, कामदेव का अपना वसंत ऋतु का सपना… अनेक नाटक, अनेक भूमिकाएं. देश-विदेश की अनेक उड़ानें. बेसाख़्ता प्रशंसाएं और पुरस्कार. कसम और भरोसा ऐसा कि 1960 में 25 बरस की उम्र में ‘नया थिएटर’ से जो नाता जुड़ा वह 2005 में जाकर इस वजह से टूटा कि देह अब विश्राम चाहती थी. आंखें कुछ पथराने लगीं, कंठ थकने लगा, कमर झुकने लगी और पांव लडखड़ाने लगे.

कुछ नाटकों में गोविंद के साथ अभिनय कर चुके कलाकारों ने जब एक दफा सवालों के जरिए उन्हें कुरेदा तो अनुभव की आंच में तपे कलाकार के जवाब भी सटीक थे- “जि़ंदगी मुझे सदा नाटक की तरह लगी. सोचता हूं, बीती को बिसार दूं पर बार-बार उलझ जाता हूं. असल जीवन में जो न बन पाया रंगमंच ने वो मौका दिया. मुझे याद आता है ‘चरणदास चोर’ का किरदार जो सदा सच बोलने का वचन अपने गुरु को देता है और उम्र भर उस कसम को निभाता है. मैंने नाटक ही नहीं, अपनी जिदगी में भी सच का दामन थामा. सच्चाई में बड़ी ताकत होती है. हम सिर उठा के जी सके तो इसी सत्य के दम पर. अक्षर ज्ञान तो मेरे पास रहा नहीं पर अनुभव को ही ज्ञान मानकर उमर काट ली. यही काम आया.”

भुलवाराम की 80 बरस की जि़ंदगी भी ऐसी ही निस्पृह, निस्वार्थ बीती. अपने गांव की चौहद्दी लांघकर समंदर पार के देशों तक नाचा की महक बिखेरने वाले इस लोकरंगी कलाकार ने आधुनिक रंगमंच पर जिस ठसक के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज की, उन छवियों का धुंधलाना आसान नहीं.

भुलवाराम के कला-जीवन की कथा भी एक इत्तेफाक है. बात 1958 की है. हबीबजी के मन में ‘नया थियेटर’ का सपना अंगड़ाई ले रहा था. वे आधुनिक रंगमंच पर छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति के नृत्य-संगीत को लेकर नाटक की नई प्रतिष्ठा करने के इच्छुक थे. इसी खोज-बीन के चलते दुर्ग के निकट रिंगनी गांव में एक रात खुले आकाश तले नाचा का जंगी जलसा उन पर जादुई असर कर गया. उनकी नज़र ऊंची आवाज़ में तर्ज़ बदल-बदल कर गा और नाच रहे एक कलाकार पर पड़ी. इस हट्टे-कट्टे खुशमिजाज युवक से नाम पूछा तो बताया- ‘भुलवाराम.’ जिस चीज का आखेट करने निकले थे, उन्हें मिल गई. उन्होंने इस ठेठ किसानी नवयुवक से जब रंगमंचीय रिश्ते का अनुरोध किया तो भुलवा ने अपना जीवन ही अभिनय को समर्पित कर दिया. गांव की हद और घर-बार दूर हो रहे थे लेकिन अपनी मिट्टी की महक और संस्कारों से सांसों का जो गहरा नाता था, उसकी कसम साथ थी. … और चल पड़ा यह देसी फ़नकार देश-दुनिया की सैर पर.

हबीब जी हतप्रभ थे भुलवाराम की प्रतिभा पर. अनपढ़ और कहने को खांटी गंवार, लेकिन अपने फ़न में इस कदर माहिर कि नाटक की हर चुनौती को पार करने की अदम्य क्षमता. सुन-सुनकर नाटक के संवाद याद करते. नाटक लोक कथा पर आधारित हो, आधुनिक कथानक लिए हो या फिर शूद्रक और शेक्सपीयर जैसे क्लासिक लेखकों के क्यों न हो. लंबे-लंबे वाक्य, उनके साथ जुड़े नृत्य और संगीत के दृश्य अनन्य पात्रों की संगति और मंच का विधान… सब कुछ पूरे अनुशासन के साथ जीने में दक्ष. चरणदास चोर, जमादारिन, बहादुर कलारिन, मिट्टी की गाड़ी, लाला शोहरत राय, गांव के नाव ससुराल, मोर नाव दामाद, आगरा बाजार, देख रहे हैं नैन… जैसी लोकप्रिय नाट्य प्रस्तुतियां जिन्होंने देखी हैं, भुलवाराम की छवियां भला कैसे धुंधली हो सकती हैं! हबीब जी गर्व से कहते- “भुलवा की आवाज़ पर मुझे हैरानी होती थी. गजब की रेंज थी उसके पास. याददाश्त भी कमाल की. बड़े-बड़े डायलॉग बिना किसी अवरोध के वह बोल लेता था. मैं सदा उसके हुनर पर रश्क करता रहा.”

उस दिन भुलवा आँखों पर काला चश्मा पहने थे. दो दिन पहले मोतियाबिंद का ऑपरेशन भोपाल के ही सरकारी अस्पताल में हुआ था. वे ‘नया थियेटर’ छोड़ चुके थे लेकिन यादों के साये उनके साथ थे. भुलवाराम अतीत को टटोलते बहुत पीछे छूट गये अपने गांव, अपनी मां, पत्नी, दोस्तों तक पहुंच गये. भारत के बड़े शहरों से लेकर अमेरिका, जर्मनी, लंदन, रूस, जापान और इटली तक की सैर कर आए. कभी किसी वाकये को याद कर खिलखिला कर हंसते तो किसी घटना पर फफक कर रो पड़ते. जीवन के रंगमंच पर बुढ़ापे की त्रासद सच्चाई जी रहे एक कलाकार से सामना करने के ये भावुक क्षण थे. “पेड़ लाख चाहे लेकिन शाख से टूटे पत्ते भला उसे कहां नसीब होते हैं.”

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)

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